6 साल के बच्चे के 5 किलो के स्कूल बैग ने उठाए सवाल, कितना होना चाहिए बैग का वजन?
भारी स्कूल बैग को लेकर अभिभावकों की चिंता बढ़ी; सरकारी गाइडलाइन में बच्चे के वजन के अनुपात में बैग रखने की बात, विशेषज्ञ भी सही फिटिंग और सीमित वजन पर जोर देते हैं

स्कूल जाने वाले छोटे बच्चों के कंधों पर किताबों और दूसरी जरूरी चीजों का बोझ लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। हाल ही में कक्षा 1 के एक बच्चे का करीब 4.5 से 5 किलो का स्कूल बैग लेकर जाने का मामला सामने आने के बाद अभिभावकों ने बच्चों के बैग के वजन और स्कूलों की व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए हैं।
मामले से जुड़ी तस्वीर सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद यह चर्चा तेज हुई कि प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों को रोजाना कितना वजन लेकर स्कूल जाना चाहिए। कई अभिभावकों का कहना है कि किताबों, नोटबुक, लंच बॉक्स और पानी की बोतल के कारण बैग का वजन बच्चों के लिए असुविधाजनक हो जाता है।
एक तस्वीर से शुरू हुई बैग के वजन पर चर्चा
सामने आई जानकारी के अनुसार, एक अभिभावक ने अपने कक्षा 1 में पढ़ने वाले बच्चे की तस्वीर साझा की, जिसमें स्कूल बैग का वजन करीब 4.5 किलो बताया गया। इसके बाद सोशल मीडिया पर बच्चों के स्कूल बैग को लेकर बहस शुरू हो गई।
अभिभावकों की चिंता सिर्फ बैग के वजन तक सीमित नहीं है। कई परिवारों का कहना है कि यदि स्कूल में लॉकर, अतिरिक्त किताबें रखने की व्यवस्था या डिजिटल सामग्री का पर्याप्त इस्तेमाल हो, तो बच्चों को रोजाना सभी किताबें घर से स्कूल और स्कूल से घर ले जाने की जरूरत कम हो सकती है।
सरकारी नीति में 10 प्रतिशत वजन का मानक
भारत सरकार की School Bag Policy 2020 में स्कूल बैग के वजन को बच्चे के शरीर के वजन के 10 प्रतिशत तक सीमित रखने की बात कही गई है। नीति में हल्के बैग, दो चौड़ी और समायोज्य स्ट्रैप, किताबों के वजन को ध्यान में रखकर चयन तथा स्कूलों में लॉकर जैसी सुविधाओं पर भी जोर दिया गया है।
इस हिसाब से यदि किसी बच्चे का वजन 20 किलो है, तो 10 प्रतिशत के मानक के अनुसार उसके बैग का वजन करीब 2 किलो होना चाहिए। हालांकि वास्तविक स्थिति में स्कूल की कक्षा, पाठ्यक्रम और बच्चे की जरूरत के अनुसार बैग की सामग्री अलग हो सकती है।
भारी बैग से क्या परेशानी हो सकती है?
बाल चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, गलत तरीके से पहना गया या जरूरत से ज्यादा भारी बैग बच्चों में कंधे, गर्दन और पीठ में दर्द का कारण बन सकता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की सलाह के मुताबिक बैग बच्चे के शरीर के अनुरूप होना चाहिए और वजन को दोनों कंधों पर समान रूप से बांटना चाहिए।
हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि भारी स्कूल बैग बच्चों में स्थायी रीढ़ की बीमारी या स्कोलियोसिस का कारण बनते हैं। उपलब्ध बाल चिकित्सा मार्गदर्शन मुख्य रूप से भारी बैग से होने वाले पीठ, गर्दन और कंधे के दर्द तथा मांसपेशियों पर पड़ने वाले तनाव को लेकर सावधानी बरतने की सलाह देता है।
बैग हल्का करने के लिए क्या किया जा सकता है?
स्कूलों और अभिभावकों की ओर से कुछ व्यावहारिक कदम बच्चों का बोझ कम कर सकते हैं। इनमें शामिल हैं:
- रोजाना जरूरत की किताबें और कॉपियां ही बैग में रखना।
- स्कूल में लॉकर या किताबें रखने की सुविधा उपलब्ध कराना।
- भारी किताबों के बजाय हल्के संस्करण या डिजिटल सामग्री का इस्तेमाल बढ़ाना।
- बैग में अनावश्यक सामान नियमित रूप से निकालना।
- दोनों कंधों पर चौड़ी और एडजस्ट होने वाली स्ट्रैप का इस्तेमाल करना।
- स्कूल टाइमटेबल इस तरह तैयार करना कि एक ही दिन बहुत अधिक किताबें न ले जानी पड़ें।
केरल में भी स्कूल बैग का वजन घटाने पर जोर
स्कूल बैग के वजन को कम करने की बहस सिर्फ अभिभावकों तक सीमित नहीं है। जनवरी 2026 में केरल सरकार ने स्कूल बैग का वजन कम करने और कक्षाओं की बैठने की व्यवस्था में बदलाव से जुड़े मसौदा प्रस्ताव पर काम किया था। प्रस्ताव में पाठ्यक्रम और टाइमटेबल में बदलाव, लॉकर, साझा पाठ्यपुस्तकों और डिजिटल किताबों जैसे विकल्पों पर भी विचार किया गया।
ऐसे में 6 साल के बच्चे का करीब 5 किलो का बैग केवल एक तस्वीर या सोशल मीडिया पोस्ट का मुद्दा नहीं रह जाता। यह स्कूलों में किताबों के प्रबंधन, होमवर्क, टाइमटेबल और बच्चों की सुविधा से जुड़े व्यापक सवालों की ओर भी ध्यान खींचता है।



