भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा अधूरी क्यों है? उज्जैन के आचार्य ने बताया पौराणिक रहस्य
हाथ-पैर पूर्ण रूप में क्यों नहीं दिखाई देते, राजा इंद्रद्युम्न और विश्वकर्मा से जुड़ी कथा में छिपा है इसका उत्तर

उज्जैन। भगवान जगन्नाथ का स्वरूप हिंदू धर्म में सबसे विशिष्ट और रहस्यमयी माना जाता है। ओडिशा के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में विराजमान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की प्रतिमाएं अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों से अलग दिखाई देती हैं। विशेष रूप से भगवान जगन्नाथ की बड़ी-बड़ी आंखें और हाथ-पैरों का पूर्ण रूप में दिखाई न देना श्रद्धालुओं के मन में कई सवाल खड़े करता है। इस रहस्य को लेकर उज्जैन के ज्योतिषाचार्य एवं धर्माचार्य आचार्य आनंद भारद्वाज ने पौराणिक मान्यता का उल्लेख किया है।
आचार्य आनंद भारद्वाज के अनुसार भगवान जगन्नाथ का अधूरा प्रतीत होने वाला स्वरूप कोई संयोग नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक आस्था और पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि यह स्वरूप सदियों से श्रद्धालुओं के लिए आस्था और जिज्ञासा का विषय बना हुआ है।
विश्वकर्मा ने रखी थी एक विशेष शर्त
पौराणिक कथाओं के अनुसार मालवा के राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान विष्णु के जगन्नाथ स्वरूप की प्रतिमा बनवाने का संकल्प लिया था। इसके लिए देव शिल्पी विश्वकर्मा को आमंत्रित किया गया। उन्होंने प्रतिमा निर्माण से पहले एक शर्त रखी कि जब तक मूर्ति निर्माण पूरा नहीं हो जाता, तब तक कोई भी व्यक्ति कक्ष का द्वार नहीं खोलेगा। यदि किसी ने बीच में प्रवेश किया तो वे कार्य अधूरा छोड़ देंगे।
राजा ने इस शर्त को स्वीकार कर लिया और प्रतिमा निर्माण का कार्य प्रारंभ हो गया। कई दिनों तक कमरे के भीतर निर्माण कार्य चलता रहा और बाहर किसी को प्रवेश की अनुमति नहीं थी।
अधीरता बनी अधूरी प्रतिमा का कारण
कथा के अनुसार एक दिन राजा इंद्रद्युम्न को कक्ष के भीतर से कोई आवाज सुनाई नहीं दी। उन्हें लगा कि प्रतिमा निर्माण पूरा हो चुका है। उत्सुकतावश उन्होंने विश्वकर्मा की शर्त का उल्लंघन करते हुए कक्ष का द्वार खोल दिया।
दरवाजा खुलते ही विश्वकर्मा नाराज होकर वहां से अंतर्ध्यान हो गए। उस समय तक भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं पूरी तरह तैयार नहीं हुई थीं। मान्यता है कि तभी से भगवान का यही अधूरा स्वरूप पूजित होता आ रहा है।
आस्था का प्रतीक है यह स्वरूप
धर्माचार्यों का मानना है कि भगवान जगन्नाथ की अधूरी प्रतीत होने वाली प्रतिमा यह संदेश देती है कि ईश्वर किसी एक निश्चित रूप या सीमा में बंधे नहीं हैं। उनका स्वरूप अनंत और सर्वव्यापी है। यही कारण है कि आज भी करोड़ों श्रद्धालु इसी दिव्य स्वरूप की पूजा-अर्चना करते हैं और इसे पूर्ण आस्था के साथ स्वीकार करते हैं।


