गुरु पूर्णिमा पर देवगुरु बृहस्पति मंदिर में विशेष पूजन, गुरु दोष से राहत की है मान्यता

उज्जैन के गोलामंडी क्षेत्र में स्थित प्राचीन मंदिर में पीली वस्तुएं अर्पित करते हैं श्रद्धालु; स्वप्न में मिले संकेत के बाद प्रतिमाएं प्रकट होने की प्रचलित कथा

उज्जैन। धर्मनगरी उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर के साथ अनेक प्राचीन धार्मिक स्थल आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। इन्हीं में गोलामंडी क्षेत्र स्थित देवगुरु बृहस्पति मंदिर भी शामिल है, जहां गुरु पूर्णिमा और प्रत्येक गुरुवार को विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के कारण यहां उज्जैन सहित विभिन्न शहरों से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

मंदिर में देवगुरु बृहस्पति ऋषि स्वरूप में विराजमान हैं। प्रतिमा में उनके हाथों में चारों वेद दर्शाए गए हैं और वे वेदों का चिंतन करते दिखाई देते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां विधि-विधान से पूजा करने पर गुरु ग्रह से जुड़ी बाधाओं का प्रभाव कम होता है और जीवन में सकारात्मकता आती है।

गुरु पूर्णिमा पर सुबह से होगी विशेष पूजा

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर मंदिर में देवगुरु बृहस्पति का अभिषेक, श्रृंगार और विशेष पूजन किया जाता है। इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान को पीले पुष्प, हल्दी, चने की दाल, बेसन के लड्डू और पीले वस्त्र अर्पित करते हैं।

मंदिर के पुजारी के अनुसार, गुरु पूर्णिमा पर दर्शन और पूजा के लिए सुबह से श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो जाता है। दिनभर धार्मिक अनुष्ठान चलते हैं और भक्त देवगुरु से विद्या, बुद्धि तथा जीवन में सही मार्गदर्शन की कामना करते हैं।

पांच गुरुवार पूजा करने की परंपरा

धार्मिक मान्यता के अनुसार लगातार पांच गुरुवार तक व्रत रखते हुए देवगुरु बृहस्पति की पूजा करना विशेष फलदायी माना गया है। श्रद्धालु निष्काम भाव से पीले रंग की वस्तुएं अर्पित कर गुरु ग्रह की कृपा प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं।

मान्यता है कि इस पूजा से शिक्षा, विवाह, संतान, आर्थिक स्थिति और व्यवसाय से जुड़ी परेशानियों में राहत मिल सकती है। हालांकि ये धार्मिक और ज्योतिषीय विश्वास हैं, जिनका पालन श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार करते हैं।

गुरु ग्रह को ज्ञान और विवेक का कारक मानते हैं

ज्योतिष में बृहस्पति को ज्ञान, विवेक, शिक्षा, धर्म, संतान, सम्मान और समृद्धि का कारक ग्रह माना जाता है। मान्यता है कि जन्म कुंडली में गुरु ग्रह की कमजोर स्थिति होने पर व्यक्ति को महत्वपूर्ण कार्यों में रुकावट, निर्णय लेने में परेशानी या आर्थिक अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है।

इसी कारण कई श्रद्धालु गुरु ग्रह से जुड़ी शांति के लिए बृहस्पति मंदिर में पूजा कराते हैं। गुरुवार के दिन पीली दाल, हल्दी, वस्त्र और पुष्प अर्पित करने की परंपरा भी इसी मान्यता से जुड़ी है।

स्वप्न के बाद हुई मंदिर स्थापना की प्रचलित कथा

देवगुरु बृहस्पति मंदिर की स्थापना से जुड़ी एक प्राचीन कथा स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित है। बताया जाता है कि बृहस्पतेश्वर महादेव ने पुजारी परिवार के एक सदस्य को स्वप्न में दर्शन देकर एक निश्चित स्थान पर प्राचीन प्रतिमाएं होने का संकेत दिया था।

इसके बाद बताए गए स्थान पर खुदाई कराई गई। मान्यता है कि खुदाई के दौरान प्राचीन शिवलिंग के साथ गणपति, नवग्रह, भैरव और शीतला माता की प्रतिमाएं प्राप्त हुई थीं। बाद में सभी प्रतिमाओं की विधि-विधान से प्राण-प्रतिष्ठा कर नियमित पूजन शुरू किया गया।

स्वयंभू स्वरूप को लेकर विशेष आस्था

श्रद्धालु देवगुरु बृहस्पति के स्वरूप को स्वयंभू मानते हैं। मंदिर में स्थापित प्रतिमा का ऋषि रूप और हाथों में सुशोभित वेद इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु गुरु को केवल ग्रह के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान और सद्मार्ग प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में पूजते हैं।

गुरु पूर्णिमा के दिन मंदिर में गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के साथ जीवन में विवेक, विनम्रता और सही दिशा प्राप्त करने की प्रार्थना की जाती है। मंदिर प्रबंधन भी श्रद्धालुओं की संभावित भीड़ को देखते हुए दर्शन और पूजा की व्यवस्थाएं करता है।

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