सुसनेर में 29 जुलाई को चातुर्मास कलश स्थापना, आर्यिका ज्ञेयश्री माताजी के सानिध्य में निकलेगी शोभायात्रा
दिगंबर जैन छोटा मंदिर से त्रिमूर्ति मंदिर तक निकलेगा चल समारोह; गुरु पूर्णिमा पर धार्मिक अनुष्ठान और वात्सल्य भोज का आयोजन

सुसनेर, दिनेश जैन, नगर का जैन समाज बुधवार, 29 जुलाई को एक विशेष धार्मिक आयोजन का साक्षी बनेगा। त्रिमूर्ति दिगंबर जैन मंदिर में आर्यिका रत्न 105 ज्ञेयश्री माताजी ससंघ के सानिध्य में चातुर्मास कलश स्थापना कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस अवसर पर दिगंबर जैन छोटा मंदिर से त्रिमूर्ति मंदिर तक भव्य शोभायात्रा भी निकाली जाएगी।
चातुर्मास समिति की ओर से आयोजन की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। दोपहर करीब 1 बजे प्रारंभ होने वाली शोभायात्रा में मंगल कलश, धार्मिक प्रतीक और बड़ी संख्या में समाजजन शामिल होंगे। श्रद्धालु भक्ति गीतों और जयकारों के साथ आर्यिका संघ की अगवानी करेंगे।
लंबे अंतराल के बाद सुसनेर नगर को आर्यिका संघ के चातुर्मास का अवसर प्राप्त हुआ है। इसे लेकर सकल दिगंबर जैन समाज में उत्साह का वातावरण है। समाज की ओर से सभी श्रद्धालुओं से कार्यक्रम में शामिल होकर धर्मलाभ लेने की अपील की गई है।
त्रिमूर्ति मंदिर में हुआ आर्यिका संघ का मंगल प्रवेश
चातुर्मास से पहले सोमवार को आर्यिका 105 ज्ञेयश्री माताजी ससंघ का नगर में मंगल प्रवेश हुआ। आर्यिका संघ चातुर्मास समिति अध्यक्ष कैलाश जैन खजांची के फार्म हाउस से विहार करते हुए त्रिमूर्ति दिगंबर जैन मंदिर पहुंचा।
इस दौरान समाजजनों और चातुर्मास समिति के सदस्यों ने आर्यिका संघ की श्रद्धापूर्वक अगवानी की। मार्ग में श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर आशीर्वाद प्राप्त किया। मंदिर पहुंचने के बाद धार्मिक विधि के साथ आर्यिका संघ का स्वागत किया गया।
आर्यिका ज्ञेयश्री माताजी, पट्टाचार्य 108 विशुद्धसागर महामुनिराज की आज्ञानुवर्ती तथा गणिनी आर्यिका 105 विश्रुतश्री माताजी की शिष्या हैं। इस वर्ष उनका ससंघ चातुर्मास सुसनेर में संपन्न होगा।
गुरु पूर्णिमा पर होगी कलश स्थापना
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर 29 जुलाई को दोपहर 2 बजे त्रिमूर्ति मंदिर में चातुर्मास कलश स्थापना का मुख्य कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। धार्मिक विधियों और मंत्रोच्चार के बीच मंगल कलश स्थापित किए जाएंगे। इसके बाद शाम 5 बजे वात्सल्य भोज का आयोजन होगा।
चातुर्मास अवधि में प्रतिदिन 1008 श्री जिन सहस्रनाम जाप और भक्तामर अनुष्ठान किए जाएंगे। इसके अतिरिक्त धार्मिक प्रवचन, पूजन, तपस्या और संस्कार से जुड़े कार्यक्रम भी आयोजित होंगे।
जैन धर्म में चातुर्मास का विशेष महत्व
जैन परंपरा में चातुर्मास को साधना, संयम और आत्मचिंतन का काल माना जाता है। वर्षा ऋतु के दौरान धरती पर अनेक सूक्ष्म जीव सक्रिय हो जाते हैं। अहिंसा के सिद्धांत का पालन करते हुए जैन साधु और साध्वियां इस अवधि में विहार नहीं करते तथा एक ही स्थान पर रहकर धार्मिक साधना करते हैं।
चातुर्मास के चार महीनों में श्रद्धालुओं को संतों का सानिध्य प्राप्त होता है। इस अवधि में धर्मसभा, प्रवचन, जाप, तप, व्रत और धार्मिक पर्वों के माध्यम से समाज को अहिंसा, करुणा और संयम का संदेश दिया जाता है।
चातुर्मास में होंगे प्रमुख धार्मिक आयोजन
वर्षायोग के दौरान सुसनेर में कई महत्वपूर्ण धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। 30 जुलाई को वीर शासन जयंती और 2 अगस्त को आर्यिका विश्रुतश्री माताजी का अवतरण दिवस मनाया जाएगा।
19 अगस्त को भगवान पार्श्वनाथ का मोक्ष कल्याणक एवं मोक्ष सप्तमी, जबकि 28 अगस्त को रक्षाबंधन पर्व को वात्सल्य दिवस के रूप में मनाया जाएगा। 17 अगस्त से 27 सितंबर तक त्याग और तपस्या से जुड़ा सोलहकारण व्रत आयोजित होगा।
13 सितंबर को आचार्य विमलसागर महाराज की जन्म जयंती मनाई जाएगी। इसके बाद 16 से 25 सितंबर तक दशलक्षण महापर्व और 27 सितंबर को क्षमावाणी पर्व आयोजित होगा।
26 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा उत्सव के बाद 8 नवंबर को चातुर्मास निष्ठापन किया जाएगा। अगले दिन 9 नवंबर को भगवान महावीर स्वामी का मोक्ष कल्याणक और दीपावली महामहोत्सव मनाया जाएगा।
