उज्जैन स्टेशन के ऐतिहासिक रेल इंजन का फिर मनेगा जन्मदिन, पिता की परंपरा अब बेटा निभाएगा

सिंधिया काल की नैरोगेज धरोहर को फूलों से सजाकर काटा जाएगा केक; स्थानीय स्मृतियों के अनुसार नेहरू और इंदिरा गांधी ने भी किया था इस रेलमार्ग पर सफर

उज्जैन। रेलवे स्टेशन परिसर में संरक्षित सिंधिया काल के ऐतिहासिक भाप इंजन से जुड़ी एक अनोखी परंपरा दोबारा शुरू होने जा रही है। कभी रेलवे कर्मचारियों और कुलियों द्वारा हर वर्ष उत्साह के साथ मनाया जाने वाला इस इंजन का जन्मदिन अब फिर उसी अंदाज में मनाने की तैयारी है। इंजन को फूलों और मालाओं से सजाने के बाद उसके सामने केक काटकर लगभग नौ दशक पुरानी रेल विरासत की स्मृतियों को ताजा किया जाएगा।

इस आयोजन को वर्षों तक कुली सफी बाबा अपने निजी खर्च से आयोजित करते थे। उनके निधन के बाद अब उनके बेटे मोहम्मद रहीस ने पिता की परंपरा को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। रहीस का कहना है कि उनके पिता का जीवन इस रेल सेवा और इंजन से गहराई से जुड़ा था। इसलिए वे इस आयोजन को केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि पिता की स्मृतियों और शहर की रेलवे विरासत के प्रति सम्मान मानते हैं।

उज्जैन से आगर के बीच चलती थी नैरोगेज ट्रेन

पुराने समय में उज्जैन और आगर के बीच नैरोगेज रेल सेवा संचालित होती थी। इस मार्ग पर भाप इंजन के माध्यम से यात्री और सामान एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाए जाते थे। सीमित परिवहन साधनों के उस दौर में यह रेल सेवा मालवा क्षेत्र के लोगों के लिए आवागमन का महत्वपूर्ण माध्यम थी।

रेल सेवा बंद होने के बाद इंजन लंबे समय तक रेलवे डिपो में सुरक्षित रखा गया। बाद में 25 जून 2006 को इसे ऐतिहासिक धरोहर के रूप में उज्जैन रेलवे स्टेशन के बाहर स्थापित किया गया। तभी से यह स्टेशन पहुंचने वाले यात्रियों और शहरवासियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

सफी बाबा ने शुरू की थी जन्मदिन मनाने की परंपरा

ऐतिहासिक इंजन के जन्मदिन का आयोजन हर वर्ष एक जनवरी को किया जाता था। सफी बाबा रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करने के साथ इसी नैरोगेज ट्रेन में चाय बेचकर परिवार की आजीविका चलाते थे। इंजन और ट्रेन से उनकी कई भावनात्मक यादें जुड़ी थीं।

इन्हीं स्मृतियों को जीवित रखने के लिए उन्होंने साथी कुलियों और रेलवे कर्मचारियों के साथ इंजन का जन्मदिन मनाना शुरू किया। आयोजन के दौरान इंजन को रंग-बिरंगे फूलों से सजाया जाता, मालाएं पहनाई जातीं और केक काटकर पुरानी रेल सेवा को याद किया जाता था।

समय के साथ यह आयोजन स्टेशन की पहचान बन गया। इंजन का जन्मदिन देखने के लिए रेलवे कर्मचारी, कुली, यात्री और आसपास के लोग भी पहुंचते थे।

पिता के बाद बेटा संभालेगा जिम्मेदारी

मोहम्मद रहीस ने बताया कि उनके पिता इस आयोजन को पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ करते थे। वे अब उनकी स्मृति में इस परंपरा को जारी रखना चाहते हैं। रहीस के अनुसार, यह कार्यक्रम केवल उनके परिवार से जुड़ा नहीं है, बल्कि उन सभी रेलवे कर्मचारियों और कुलियों की स्मृतियों का हिस्सा है, जिन्होंने कभी इस रेल सेवा के साथ काम किया था।

आयोजन में पुराने कर्मचारियों और कुलियों को आमंत्रित करने की भी योजना है। उनके अनुभवों के माध्यम से युवा पीढ़ी को उज्जैन-आगर नैरोगेज रेल सेवा के इतिहास से परिचित कराया जाएगा।

नेहरू और इंदिरा गांधी के सफर का भी दावा

स्थानीय रेलवे कर्मचारियों और पुराने कुलियों से जुड़ी स्मृतियों के अनुसार, इस नैरोगेज रेलमार्ग पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी यात्रा की थी। यह भी बताया जाता है कि सिंधिया राजघराने के जीवाजीराव सिंधिया ने उज्जैन से आगर तक इसी रेल सेवा से सफर किया था।

इन दावों के कारण यह इंजन केवल रेलवे की तकनीकी धरोहर नहीं, बल्कि मालवा क्षेत्र के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास से जुड़ी निशानी भी माना जाता है।

इंजन नंबर-77 की ये थीं विशेषताएं

स्टेशन परिसर में संरक्षित यह जेड-बी श्रेणी का भाप इंजन है, जिसका नंबर 77 बताया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इंजन का निर्माण डब्ल्यूजी बैगनाल कंपनी ने किया था। इसकी जल भंडारण क्षमता करीब 1300 गैलन और कोयला रखने की क्षमता लगभग 2.25 टन थी।

इंजन का कुल वजन लगभग 27.5 टन बताया जाता है। उस समय इसके निर्माण पर करीब एक लाख 61 हजार 276 रुपये खर्च हुए थे। इंजन ने लगभग 20 वर्षों तक सेवा दी और 13 अप्रैल 1988 को अंतिम यात्रा की थी।

नई पीढ़ी को विरासत से जोड़ने का प्रयास

रेलवे स्टेशन के बाहर रखा यह इंजन आज भी उस दौर की याद दिलाता है, जब भाप से चलने वाली ट्रेनें मालवा के छोटे-बड़े नगरों को आपस में जोड़ती थीं। जन्मदिन की परंपरा फिर शुरू होने से इस ऐतिहासिक धरोहर को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ने की उम्मीद है।

आयोजकों का मानना है कि ऐतिहासिक वस्तुओं को केवल प्रदर्शित करना पर्याप्त नहीं है। उनसे जुड़ी कहानियों, कर्मचारियों के अनुभवों और स्थानीय परंपराओं को भी सहेजना आवश्यक है। इंजन का जन्मदिन इसी उद्देश्य से दोबारा मनाया जाएगा।

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